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भारतीय चित्रमाला के (ग़ैर फीचर) निर्देशकों ने ग़ैर-फीचर फिल्मों के चुनौतियां।

भारतीय चित्रमाला के (ग़ैर फीचर) निर्देशकों ने ग़ैर-फीचर फिल्मों के चुनौतियां।

By : Binod Jha
Dec 01, 2018
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49वें भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय चित्रमाला खंड के अंतर्गत तीन ग़ैर-फीचर फिल्मों, ग्यामो क्वीन ऑफ द माउण्टेंस, मलाई एवं पैम्फ्लैट के निर्देशकों ने गोवा में आज एक प्रेस वार्ता को संबोधित किया ।

मलाई फिल्म ओडीशा के सुदूर क्षेत्र में स्थित एक गांव में एक अत्यंत निर्धन बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है जो अपनी पसंदीदा आइसक्रीम की खोज में महान भारतीय विवाह के स्याह पक्ष का साक्षी बनता है । फिल्म की समन्वयक शर्मिष्ठा मैती ने भारतीय समाज की असंवेदनशील परम्पराओं कीअटलता पर टिप्पणी की । उन्होंने समाज में निर्धन वर्ग के उन लोगों का उदाहरण दिया जिन्हें विवाह समारोहों में निकले जुलूसों के दौरान अपने सिरों पर बिजली के भारी लैम्प ढोकर ले जाने पड़ते हैं । उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य अधिक आकर्षित करने वाले माध्यम सिनेमा के ज़रिये दर्शकों तक इस कड़वी सच्चाई को लाना था ।

भारतीय चित्रमाला के (ग़ैर फीचर) निर्देशकों ने ग़ैर-फीचर फिल्मों के चुनौतियां।

शेखर रणखम्बे ने लघु फिल्म ‘पैम्फ्लैट’ को बनाने के दौरान महाराष्ट्र के एक गांव के स्थानीय बाल-कलाकारों के साथ अपने अनुभव साझा किये ।उन्होंने बताया किउनको बच्चों के साथ कार्य करने में मज़ा आया क्योंकि वह बेहद ईमानदारी एवं लगाव से अपना कार्य करते हैं । उन्होंने कहा कि आज के ज़माने में धार्मिक स्वभाव के अग्रेषित संदेश भी सामाजिक समरसता के लिये ख़तरा पैदा कर सकते हैं । इस फिल्म में नायक एक छोटा बच्चा एक धार्मिक रिसाले, जिसको वह धन की कमी के कारण छपवाकर वितरित नहीं कर पाता, को पढ़ कर अपने लियेबड़े दुर्भाग्य को आमंत्रित कर लेता है । इससे उत्पन्न डर जीवन में बेहतर करने की चाह रखने वाले उस ऊर्जावान बच्चे को मानसिक तौर पर भयाक्रांत बच्चे में परिवर्तित कर देता है ।

वन्य जीवन पर बने वृत्तचित्र ग्यामो-क्वीन ऑफ द माउण्टेन की समन्वयक सुश्री डोएल त्रिवेदी लद्दाख क्षेत्र में हिम तेंदुओं की स्थिति के बारे में बताती हैं । हिम तेंदुओं की अच्छी ख़ासी तादात स्थानीय वास में स्थिरता को दर्शाती है । अतएव हिम तेंदुओं पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों एवं क्षीणहोती उनकी तादात का चित्रण करने से यह फिल्म मानव जनित जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की एक ईमानदार व्याख्या करती है । रिवरबैंक स्टूडियोज़ द्वारा डिस्कवरी कम्युनिकेशंस इण्डिया के साथ मिल कर निर्मित यह फिल्म भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) समेत अनेक फिल्म महोत्सवों में दिखाई गई है ।यह 27 नवम्बर को वन्यजीव चैनल एनिमल प्लैनेट पर भी प्रसारित की जाएगी ।
 

भारतीय चित्रमाला के (ग़ैर फीचर) निर्देशकों ने ग़ैर-फीचर फिल्मों के चुनौतियां।

वन्यजीवों पर फिल्में एवं लघु फिल्में बनाने पर निर्देशक गौतम पांडे ने अपने विचार साझा किये । उन्होंने कहा कि फिल्म की अवधि से अधिक विषयवस्तु एवं संदेश का प्रकार है जिसको वह आगे ले जाना चाहते हैं - जो कि वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण है । यह भारतीय दर्शकों में स्थान बना सकते हैं । यदि हम ऐसी फिल्मों को बड़े मंचों पर ले जा सकें तो दर्शक इन कहानियों को भी पसंद करना शुरु कर देंगे । 

​केवल फिल्म महोत्सवों के अतिरिक्त लघु फिल्मों को मल्टीप्लैक्स पर दिखाए जाने की संभावना पर एक प्रश्न का उत्तर देते हुए सभी निर्देशकों ने कहा कि यदि कोई इन फिल्मों को बड़े पर्दे पर दिखाने हेतु सक्रिय सरकारी सहायता प्राप्त कर पाए तो यह मददगार होगा ।सत्र की समाप्ति करते हुए राजदीप पॉल ने भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्व-2018 (आईएफएफआई-2018) में अपने अनुभव का ज़िक्र किया एवं जिस प्रभावी ढंग से फिल्म महोत्सव आयोजित किया गया है उसकी प्रशंसा की, साथ ही सिनेमाघरों के विशेष प्रक्षेपण गुण की भी तारीफ़ की ।



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