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पत्रकारों पर कहर बरपाती शिब्बू की सियासत

पत्रकारों पर कहर बरपाती शिब्बू की सियासत

By : संवाददाता: बिनोद कुमार झा
Jul 02, 2018
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 मदद के आस में माँ का आखरी सांस तक नहीं देख पाया,एक ग़रीब पत्रकार बेटा|
मुक़म्मल मध्य प्रदेश की मीडिया और छी मिनिस्टर के बीच मैनेज का ज़िक्र ख़बरों के समुन्द्री ज़खीरों में भी जमा नही हो सकता इसलिए भेदभाव के नाम से टूटते हुए हर टुकड़ो को ख़बरों के हिस्से बनाकर पेश करने की कोशिश करता हूँ 

भोपाल: राजधानी के सिरयाने पर बैठ के समाचार बनाने वालों की जमात में से एक ग़रीब पत्रकार बेटा बदनसीबी से अपनी बीमार माँ की ज़िंदगी को बचाने की भिक्षा मांगते मांगते अफ़सरो के दफ्तरों से सूबे के वज़ीर की दहलीज़ तक में दाख़िल हो गया था लेकिन अफ़सोस ज़ालिमाना हुक़ूमत के हाकीम के ह्रदय में दया की एक बूंद भी नही पसीजी! दिखावे के देवता के दर से वैसे तो उदासियों की उंगली प्रदेश भर के उन लाखो के तशरीफ़खानों में होती रहती है जो मुख़ालते में शिवराज से मिलने सूबे के अलग अलग शहरों से सीधे वज़ीरखाना पहुँच जाते हैं। नादां वो ये नही जानते कि ये शिवराज सिर्फ सभा सभा भाषण भाषण मीडिया और हज़ारो की भीड़ में अपने आप को मसीहा कहलाने का ढोल पिटता है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त हर प्रदेश के उन आम फरियादियों को पता है जो वज़ीरखाने से निराश होकर निकलते हैं लेकिन इस बार सिर्फ एक पत्रकार ही ख़ाली हाथ नही लोटा बल्कि सूबे की एक बीमार माँ का मज़बूर बेटा मायूस होकर वज़ीरखाने से बार बार वापस गुज़रा है !!

भोपाल के गाल को चूमते रायसेन नगर के रुक्सार पर आज शर्मिंदगी की झुर्रियां इस कदर उभर आई है कि जिन झुर्रियों कि दरारें प्रदेश भर के उन तमाम इलाज़ के अभाव से जूझ रहे गरीबों के दर्द पर मरहम रगड़ के भी नहीं भरी जा सकती। 
 

पत्रकारों पर कहर बरपाती शिब्बू की सियासत

कैसे माँ कि बीमारी विवश्ता और बेबसी की दर्दनाक दास्तां बन गई

रायसेन निवासी पत्रकार साज़िद लम्बे वक़्त से अपनी बीमार माँ का भोपाल में रहकर इलाज़ करा रहा था बीमार माँ की ख़िदमत में मसरूफ़ साज़िद के पास कुछ महीनों में ही जमा पूंजी ख़त्म हो गई और इधर माँ के मर्ज़ में सुधार आने की जगह इस हद तक बिगाड़ आ गया कि बीमारी हर रोज़ माँ को जिंदा रखने के लिए एक निर्धन बेटे से नोटों कि बलि मांगने लगी! बेबस बैठा बावजूद पत्रकार होने के लाचारगी से अपना दामन फ़ैला माँ की ज़िन्दगी कि भिक मांगने राजधानी के हूकूमति दफ्तरों व वज़ीरखाने में दरख़ास्तनामे दे कर दया कि भींख मांगता रह गया लेकिन छाती ठोक कर खुद को प्रदेश के ग़रीबो का मसीहा कहने वाले शिवराज के कान में जूं तक नही रेंगी इधर गैंगरिया नामक बीमारी ईलाज की कमी के चलते एक माँ के जिस्म में कुछ इस क़दर समा गई कि डॉक्टरों को पत्रकार साज़िद की माँ के पैर काटने पड़ गए जिस दर्द को जब चन्द हमदर्द पत्रकारों ने समाचार की शक़्ल में साझा किया तो शिब्बू के बेरहम गुर्गे हरक़त में आ गए और खानापूर्ति करते हुए ईलाज के लिए ऊंट के मुंह मे जीरा बराबर रक़म निजी चिकित्सालय में जमा करवा दी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब साज़िद की माँ के इलाज़ में पैसा लगाना ऐसा बन चुका था जैसे हाथी को रोटी खिलाना बहरहाल ईलाज़ के लिए हासिल हुई शासकीय रक़म को हॉस्पिटल के एकाउंट से बीमारी चन्द दिनों में ही ले ले कर खा गई और सेहत कि डकार भी नही ली। बल्कि बीमारी के ज़ालिमाना जबड़ों ने एक कमज़ोर बुज़रुग माँ के जिस्म को फिर कतरने का मन बना लिया डॉक्टरों ने मरीज़ की जान बचाने के लिए कटे हुए पैरो के ऊपरी हिस्से को और भी काटने का ज़िक्र किया। हॉस्पिटल एकाउंट में जैसे ही पैसा खत्म हुआ वैसे ही मरीज़ की सहूलियतें धीरे-धीरे खत्म होने लगी।

पत्रकारों पर कहर बरपाती शिब्बू की सियासत

माँ को इस हाल में देख एक बेबस बेटा अपने आप को मज़बूरियों कि गिरफ्त में महसूस करनें लगा परन्तु साज़िद ने अपने आप को मायूस नही होने दिया माँ को हॉस्पिटल में छोड़ सुबह से इलाज़ के लिए पेसो के इंतेज़ाम के चलते दिन भर हुक़ूमत के हाकिमों के दरबार मे चक्कर लगाता रहता शिवराज से तीन बार मिलके मदद कि गुहार भी लगाई लेकिन आश्वासन भरी औपचारिकता के सिवा कुछ भी हाथ नही लगा।
उदासी में तर जब साज़िद हॉस्पिटल अपनी माँ के पास पहुंचा तो दिखावेदार मुस्कुराहट के बाद भी साज़िद कि आंखे दर्द छुपा ना सकी और एक बेटा फफक के रो पड़ा क्यों कि आज की रात दुनिया के लिए चांद की रात थी और साज़िद के लिए अमावस्या की तरह सुबह लोग अपने घरों से खुशियों के साथ ईदगाह कि ज़ानिब जा रहे थे और साज़िद हॉस्पिटल से माँ के मर्ज़ का दर्द लेकर ईदगाह कि तरफ़ बढ़ रहा था। ईद कि नमाज़ के बाद कई जानपहचान वालो ने साजिद से गले तो मिला लेकिन उसके सीने में कैद तड़पते दिल के दर्द को कोई नही भांप सका ईदगाह में साज़िद महज़ नमाज़ ही अदा करनें की गरज़ से ही नही गया था बल्कि मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कर अपनी माँ के ईलाज़ की मिन्नते करने के लिए दरख़्वास्त भी साथ ले गया था। दिखावे के मसीहा से मुलाकात कर ईद के मुबारक़ मौक़े पर शिद्दत से अपनी माँ के इलाज़ ज़ारी रखने मिन्नत भी की लेकिन क़ारून फ़िरऔन की तर्क पर पक्षपात भेदभाव करने वाले शिवराज ने एक माँ कि ज़िंदगी दरख़्वास्त अपने बहरूपिए गुर्गो के हाथ में थमा दी।



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